5 यो सब सुन क, दानिय्येल न नजर सी यो देख्यो कि अऊर दोय आदमी खड़ो हय, एक त नदी को यो किनार पर, अऊर दूसरो नदी को ऊ किनार पर हय। 6 तब जो आदमी सन को कपड़ा पहिन्यो हुयो नदी को पानी को ऊपर होतो, ओको सी उन आदमियों म सी एक न पूच्छ्यो, “इन आश्चर्य कर्मों को अन्त कब तक होयेंन?” 7 तक जो आदमी सन को कपड़ा पहिन्यो हुयो नदी को पानी को ऊपर होतो, ओन मोरो सुनतोच दाहिनो अऊर बायो, अपनो दोयी हाथ स्वर्ग को तरफ उठायक, हमेशा जीन्दो रहन वालो की कसम खाय क कह्यो, “या दशा साढे़ तीन साल तकच रहेंन; अऊर जब पवित्र प्रजा की शक्ति टूटत टूटत खतम होय जायेंन, तब ये सब बातें पूरी होयेंन।” 8 या बात मय सुनत त होतो पर कयी नहीं समझ्यो। तब मय न कह्यो, “हे मोरो प्रभु, इन बातों को आखरी परिनाम का होयेंन?” 9 ओन कह्यो, “हे दानिय्येल, चली जा; कहालीकि या बातें आखरी समय लायी बन्द हंय अऊर इन पर मुहर लगायी हुयी हय। 10 बहुत सो लोग त अपनो अपनो ख निर्मल अऊर शुद्ध करेंन, अऊर स्वच्छ होय जायेंन; पर दुष्ट लोग दुष्टताच करतो रहेंन; अऊर दुष्टों म सी कोयी या बातें नहीं समझायेंन; पर जो बुद्धिमान हंय हिच समझायेंन।[d] 11 जो दिन रोज की होमबलि चढ़ानो बन्द होय जायेंन, अऊर बेकार चिजे वा जागा पर स्तापित करी जायेंन, जो नाश को वजह होयेंन, तब तक बारा सौ नब्बे दिन बीत जायेंन।[e] 12 का हि धन्य हय ऊ, जो धीरज धर क तेरा सौ पैंतीस दिन को आखरी तक भी पहुंचे। 13 दानिय्येल अब तय जाय क आखरी तक ठह्यरयो रह्य; अऊर तय आराम करतो रह्यजो; अऊर उन दिनों को आखरी म तय अपनो निज भाग पान लायी खड़ो होजो।”
<- दानिय्येल 11
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